दिन 14: बाल्यकाल के खेल और संकेत
द्वेष की शुरुआत: भीम-दुर्योधन की प्रतिस्पर्धा, विष प्रयोग और नागलोक की रहस्यमय यात्रा
बचपन के वो दिन: जब बोया गया वैर का बीज
पांडवों और कौरवों का बाल्यकाल हस्तिनापुर के राजमहलों में एक साथ बीता। पांच पांडव और सौ कौरव - कुल 105 बालक एक ही आंगन में खेले, एक ही गुरु से शिक्षा पाई, परंतु उनके मनों में जो भाव थे, वे अलग-अलग थे।
भीम का बालसुलभ पराक्रम
बचपन में भीम अत्यंत बलवान थे। वे अक्सर कौरव बालकों को परेशान करते, उनकी गेंद छीन लेते, उन्हें पेड़ों पर चढ़ा देते और उतरने नहीं देते। यह सब बालसुलभ शरारत थी, परंतु दुर्योधन के मन में यह बात चुभने लगी। वह भीम को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानने लगा।
धृतराष्ट्र अपने पुत्रों से अंधा प्रेम करते थे, जबकि पांडु के पुत्र होने के कारण पांडवों के प्रति उनके मन में एक अलग ही भाव था। गांधारी भी अपने पुत्रों को अधिक स्नेह देती थीं। कुंती अकेली ऐसी माता थीं, जो पांचों पांडवों का लालन-पालन कर रही थीं, जबकि माद्री पहले ही सती हो चुकी थीं।
दुर्योधन की बढ़ती ईर्ष्या
दुर्योधन देखता था कि भीम कितना बलवान है। वह देखता था कि अर्जुन की धनुर्विद्या में रुचि कितनी गहरी है। युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा, नकुल का सौंदर्य, सहदेव की विद्वत्ता - यह सब उसे कचोटता था। उसे लगता था कि राजगद्दी का असली अधिकारी वह है, परंतु ये पांचों उसके मार्ग का कांटा हैं।
"पिताश्री! ये पांडव हमसे अधिक बलवान हैं। ये हमें राज्य से वंचित कर देंगे। हमें इनके बारे में कुछ सोचना होगा।"
- दुर्योधन, धृतराष्ट्र से
धृतराष्ट्र दुर्योधन की बात सुनकर चिंतित हो जाते, किंतु पुत्रमोह के कारण वे कुछ निर्णायक कदम नहीं उठा पाते थे। उन्होंने हमेशा दुर्योधन की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दिया, जो आगे चलकर महाभारत का कारण बना।
भीम को विष देने का प्रयास
दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि की सलाह पर भीम को मारने की योजना बनाई। उसने सोचा कि यदि भीम मर जाएगा, तो पांडवों की शक्ति कम हो जाएगी।
गंगा तट पर भोज
दुर्योधन ने सभी कौरवों और पांडवों के साथ गंगा तट पर भोज का आयोजन किया। वहाँ उसने भीम के भोजन में कालकूट नामक प्राणघातक विष मिला दिया। भीम ने वह भोजन किया और मूर्छित होकर नदी में गिर गए।
नागलोक में प्रवेश
विष के प्रभाव से भीम गंगा की गहराई में डूबते चले गए। वे नागलोक (नागों का लोक) में जा पहुँचे। वहाँ असंख्य नागों ने उन्हें डस लिया, परंतु विष के कारण उनके शरीर पर नागों के दंश का कोई प्रभाव नहीं हुआ।
वासुकी का आशीर्वाद
नागराज वासुकी को जब इस बात का पता चला, तो वे भीम के पास आए। उन्होंने भीम को विषमुक्त कर दिया और उन्हें अमृत पान कराया। इससे भीम की शक्ति दस गुना बढ़ गई। वासुकी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनके शरीर में कभी कोई विष प्रभाव नहीं करेगा और वे अजेय रहेंगे।
आठ दिन बाद भीम पुनः हस्तिनापुर लौट आए। सभी चकित रह गए। दुर्योधन का षड्यंत्र विफल हो गया। यह घटना पांडवों और कौरवों के बीच वैर की पहली बड़ी घटना थी।
द्रोणाचार्य का आगमन
इसी समय के आसपास, महान धनुर्धर द्रोणाचार्य हस्तिनापुर पधारे। भीष्म ने उन्हें राजकुमारों का गुरु नियुक्त किया। द्रोणाचार्य ने सभी राजकुमारों को शस्त्रविद्या सिखानी शुरू की। अर्जुन ने जल्द ही अपनी लगन और निपुणता से गुरु का मन जीत लिया। द्रोणाचार्य ने उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य माना और उन्हें ब्रह्मास्त्र चलाने का मंत्र भी दिया।
अर्जुन की विशेष स्थिति
द्रोणाचार्य ने अर्जुन को सबसे अधिक महत्व दिया। रात में जब अन्य सोते थे, अर्जुन अभ्यास करते थे। गुरु ने उन्हें एकाग्रता का पाठ पढ़ाया और उन्हें यह विश्वास दिलाया कि वे संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनेंगे। इससे अन्य कौरवों, विशेषकर दुर्योधन की ईर्ष्या और बढ़ गई।
एकलव्य प्रकरण
एक और महत्वपूर्ण घटना इसी काल में घटी - एकलव्य का प्रकरण। एकलव्य निषादपुत्र था, जो द्रोणाचार्य से शिक्षा लेना चाहता था, परंतु उसे राजकुमारों के साथ बैठने का अधिकार नहीं मिला। उसने जंगल में जाकर द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसे ही गुरु मानकर अभ्यास किया। वह अद्वितीय धनुर्धर बन गया।
जब द्रोणाचार्य और अर्जुन को इसका पता चला, तो वे हैरान रह गए। द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया, जिससे वह धनुष चलाने में असमर्थ हो गया। यह घटना उस युग की जातिगत विषमता को दर्शाती है। अर्जुन के लिए यह राहत थी कि उनसे बड़ा कोई धनुर्धर नहीं रहा, किंतु यह द्रोणाचार्य के पक्षपात का भी परिचायक था।
खेल-खेल में बढ़ती दूरी
दिन प्रतिदिन पांडवों और कौरवों के बीच की दूरी बढ़ती गई। भीम अपनी शक्ति से कौरवों को हराते रहे। अर्जुन अपनी विद्या से सबको चकित करते रहे। युधिष्ठिर अपने धर्म और न्याय से सबका मन जीतते रहे। दुर्योधन और दुशासन इस सबको अपने लिए खतरा मानने लगे।
बाल्यकाल की महत्वपूर्ण घटनाएँ:
- भीम का बल प्रदर्शन: कौरव बालकों को परेशान करना, पेड़ों पर चढ़ाना, कुश्ती में हराना।
- विष प्रयोग: दुर्योधन द्वारा भीम को मारने का पहला प्रयास, नागलोक में भीम की यात्रा।
- द्रोणाचार्य का आगमन: राजकुमारों की शिक्षा आरंभ, अर्जुन की विशेष स्थिति।
- एकलव्य प्रकरण: द्रोणाचार्य का पक्षपात, जातिगत भेदभाव।
- दुर्योधन की ईर्ष्या: पांडवों के प्रति बढ़ता द्वेष, राज्य हड़पने की इच्छा।
विदुर की चिंता
विदुर, जो धृतराष्ट्र के सबसे छोटे भाई और अत्यंत बुद्धिमान थे, इस सबको देखकर चिंतित रहते थे। वे धृतराष्ट्र को समझाते थे कि पुत्रमोह में अंधे न हों और पांडवों के साथ न्याय करें। किंतु धृतराष्ट्र पर दुर्योधन और शकुनि का प्रभाव बढ़ता जा रहा था।
बाल्यकाल के ये दिन ही वह समय था, जब पांडवों और कौरवों के बीच की दरार गहरी होने लगी थी। खेल-खेल में शुरू हुई यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे घोर शत्रुता में बदल गई। अगले अध्याय में हम द्रोणाचार्य की शिक्षा, गुरु दक्षिणा और राजकुमारों की अग्निपरीक्षा की कथा पढ़ेंगे।
घटनाक्रम
बाल्यकाल का आरंभ
पांडव और कौरव एक साथ हस्तिनापुर में पलते-बढ़ते हैं। भीम अपनी शक्ति से कौरवों को परेशान करते हैं।
दुर्योधन की ईर्ष्या
दुर्योधन भीम की शक्ति और अर्जुन की विद्या को देखकर ईर्ष्या करने लगता है। शकुनि उसे उकसाता है।
गंगा तट पर भोज
दुर्योधन भीम को विष देता है और वह बेहोश होकर गंगा में गिर जाता है।
नागलोक में भीम
भीम नागलोक पहुँचते हैं, नागों द्वारा डसे जाते हैं, और नागराज वासुकी उन्हें अमृत पान कराते हैं।
भीम की वापसी
आठ दिन बाद भीम हस्तिनापुर लौटते हैं, दुर्योधन का षड्यंत्र विफल होता है।
द्रोणाचार्य का आगमन
द्रोणाचार्य राजकुमारों के गुरु बनते हैं। अर्जुन उनके प्रिय शिष्य बनते हैं।
एकलव्य प्रकरण
एकलव्य द्रोण की मूर्ति से शिक्षा लेकर महान धनुर्धर बनता है, द्रोण उसका अंगूठा माँग लेते हैं।
प्रमुख पात्र
भीम
वायुपुत्र, महाबली, बाल्यकाल में कौरवों को परेशान करने वाले। विष प्रयोग में बच निकले और नागलोक से अमृत प्राप्त किया।
दुर्योधन
ज्येष्ठ कौरव, ईर्ष्यालु, महत्वाकांक्षी। भीम को मारने का पहला प्रयास करता है। पांडवों का घोर शत्रु।
द्रोणाचार्य
राजकुमारों के गुरु, महान धनुर्धर। अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ शिष्य मानते हैं। एकलव्य का अंगूठा माँग लेते हैं।
अर्जुन
इंद्रपुत्र, धनुर्विद्या में अद्वितीय। गुरु द्रोण के प्रिय शिष्य। रात-दिन अभ्यास करने वाले।
वासुकी
नागराज, जिन्होंने भीम को विषमुक्त किया और अमृत पान कराया, जिससे भीम की शक्ति दस गुना बढ़ गई।
एकलव्य
निषादपुत्र, जिसने द्रोण की मूर्ति से शिक्षा लेकर अद्वितीय धनुर्विद्या प्राप्त की, परंतु गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा गँवा दिया।
विदुर
धृतराष्ट्र के भाई, बुद्धिमान और नीतिज्ञ। धृतराष्ट्र को पांडवों के साथ न्याय करने की सलाह देते हैं।
शकुनि
गांधारी के भाई, दुर्योधन के मामा। दुर्योधन को पांडवों के विरुद्ध षड्यंत्र रचने के लिए उकसाते हैं।
जीवन के पाठ
ईर्ष्या का विनाशकारी प्रभाव
दुर्योधन की ईर्ष्या ने उसे अपने ही चचेरे भाइयों का शत्रु बना दिया। ईर्ष्या मनुष्य को अंधा बना देती है।
धैर्य और साहस
भीम ने विष प्रयोग के बाद भी धैर्य नहीं खोया और साहसपूर्वक वापस लौटे। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य ही काम आता है।
पक्षपात का दुष्परिणाम
द्रोणाचार्य का अर्जुन के प्रति पक्षपात और एकलव्य के साथ अन्याय नीति के विपरीत था। पक्षपात अधर्म को जन्म देता है।
बुद्धि का दुरुपयोग
शकुनि ने अपनी बुद्धि का प्रयोग षड्यंत्र रचने में किया। बुद्धि का दुरुपयोग विनाशकारी होता है।
प्रतिभा का सम्मान
एकलव्य ने सिद्ध किया कि यदि इच्छाशक्ति प्रबल हो, तो बिना गुरु के भी विद्या प्राप्त की जा सकती है, लेकिन समाज का भेदभाव उसे दबा देता है।
माता-पिता की भूमिका
धृतराष्ट्र का पुत्रमोह और गांधारी का अंध प्रेम ही कौरवों के दुराचार का कारण बना। संतान को सही मार्गदर्शन देना आवश्यक है।