दिन 21: अर्जुन द्वारा स्वयंवर विजय
भाग्य और परिश्रम: मत्स्य यंत्र भेदन, ब्राह्मण वेश में अर्जुन का अद्भुत कौशल
द्रौपदी का स्वयंवर: एक भव्य आयोजन
द्रौपदी जब युवा हुईं, तो उनका रूप-सौंदर्य पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध हो गया। द्रुपद ने अपनी पुत्री के लिए एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया। उन्होंने एक अत्यंत कठिन परीक्षा रखी - मत्स्य यंत्र का भेदन।
मत्स्य यंत्र की चुनौती
स्वयंवर सभा में एक ऊँचे स्तंभ पर एक मत्स्य (मछली) का चित्र बनाया गया था। मत्स्य की आँख पर एक लक्ष्य था। चुनौती थी - केवल मत्स्य की आँख का निशाना लगाना, और वह भी बिना मत्स्य के नीचे घूमते चक्र में उसके प्रतिबिंब को देखे। दूसरे शब्दों में, लक्ष्य केवल उसके प्रतिबिंब को देखकर करना था। यह अत्यंत कठिन परीक्षा थी।
द्रुपद का उद्देश्य केवल अपनी पुत्री का विवाह करना नहीं था, बल्कि वह यह भी सुनिश्चित करना चाहता था कि उसकी पुत्री का वर सबसे योग्य हो। द्रौपदी की सुंदरता और द्रुपद के राज्य का वैभव देखने के लिए दूर-दूर से राजा, महाराजा और राजकुमार आए।
राजाओं की असफलता
स्वयंवर के दिन पूरी सभा सज गई। द्रौपदी सोने के सिंहासन पर विराजमान थीं। उनके हाथ में वरमाला थी। एक-एक करके सभी राजा धनुष उठाने आगे बढ़े।
दुर्योधन का प्रयास
दुर्योधन सबसे पहले आगे आया। उसने पूरी शक्ति लगाकर धनुष उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह धनुष को झुका भी नहीं सका। वह असफल होकर लौट गया। उसका मुख निराशा से झुक गया।
अन्य राजाओं की विफलता
शल्य, जरासंध, शिशुपाल, दंतवक्र, भगदत्त, रुक्मी सहित सैकड़ों राजाओं ने प्रयास किया। कुछ धनुष उठा भी लेते थे, लेकिन प्रत्यंचा चढ़ाने में असफल रहते थे। कुछ प्रत्यंचा चढ़ा लेते थे, लेकिन निशाना नहीं लगा पाते थे। कोई भी सफल नहीं हो पाया।
कर्ण का प्रयास
जब सभी राजा असफल हो गए, तो कर्ण आगे आया। उसने धनुष उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई और निशाना साधा। लेकिन द्रौपदी ने कहा, "मैं सूतपुत्र से विवाह नहीं करूंगी।" कर्ण ने धनुष नीचे रख दिया और अपमानित होकर सभा से बाहर चला गया। यह कर्ण के जीवन का दूसरा बड़ा अपमान था।
सभी राजा असफल हो चुके थे। द्रुपद का मुख निराशा से झुक गया। उन्होंने सोचा, "क्या मेरी पुत्री अविवाहित रह जाएगी?" लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी।
ब्राह्मण वेश में पांडव
इससे पहले, जब पांडव वनवास में थे, तो उन्होंने ब्राह्मणों के वेश में विभिन्न राज्यों में भ्रमण किया। वे इसी वेश में द्रौपदी के स्वयंवर में पहुँचे। सभी राजा उन्हें साधारण ब्राह्मण समझ रहे थे।
जब सभी राजा असफल हो गए, तो पांडवों की पंक्ति से भीम उठे। वे धनुष के पास गए, लेकिन अर्जुन ने उन्हें रोक दिया। अर्जुन ने कहा, "भीम, यह कार्य मुझे करने दो।" अर्जुन धनुष के पास गए। उन्होंने उस भारी धनुष को आसानी से उठा लिया, प्रत्यंचा चढ़ाई, और अपनी दृष्टि केवल प्रतिबिंब पर केंद्रित की।
पूरी सभा सन्नाटे में बदल गई। सबकी निगाहें उस ब्राह्मण पर थी जो इतने बड़े-बड़े राजाओं के असफल होने के बाद भी धनुष उठा रहा था।
अर्जुन का लक्ष्य भेदन
अर्जुन ने अपनी एकाग्रता को एक बिंदु पर केंद्रित किया। उन्होंने मत्स्य के प्रतिबिंब को देखा और बाण छोड़ दिया। बाण सीधे मत्स्य की आँख में जा लगा। पूरी सभा तालियों से गूंज उठी।
अर्जुन की विजय
द्रौपदी ने मुस्कुराते हुए अपने हाथों से वरमाला उठाई और उस ब्राह्मण के गले में डाल दी। उसने अपने मन में कहा, "यही वह हैं जो मेरे योग्य हैं।" अर्जुन ने वरमाला ग्रहण की और सभी राजाओं की ओर देखा।
अर्जुन की इस सफलता ने सभी को चकित कर दिया। राजाओं में क्षोभ और क्रोध की लहर दौड़ गई। वे सोचने लगे कि एक साधारण ब्राह्मण उनसे बढ़कर कैसे हो सकता है?
"हम सब राजा और राजकुमार असफल हो गए, और एक साधारण ब्राह्मण इस कठिन परीक्षा में सफल हो गया? यह हमारा अपमान है। हम इस ब्राह्मण को द्रौपदी को नहीं ले जाने देंगे।"
- क्रोधित राजाओं की घोषणा
भीम और अर्जुन का युद्ध
क्रोधित राजाओं ने पांडवों पर आक्रमण कर दिया। भीम और अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्र उठाए। भीम ने अपनी गदा से असंख्य राजाओं को परास्त कर दिया। अर्जुन ने अपने बाणों से शत्रु सेना को चीर दिया।
भीम का पराक्रम
भीम गदा लेकर राजाओं के बीच कूद पड़े। उनकी गदा के एक वार से ही सैकड़ों राजा धराशायी हो गए। उनका रौद्र रूप देखकर सभी भयभीत हो गए।
अर्जुन का कौशल
अर्जुन ने अपने बाणों से राजाओं के अस्त्र-शस्त्र नष्ट कर दिए। उन्होंने किसी को मारा नहीं, केवल उन्हें निहत्था कर दिया। उनकी निशानेबाजी इतनी सटीक थी कि राजा डरकर भागने लगे।
श्रीकृष्ण और बलराम भी उस सभा में उपस्थित थे। उन्होंने पहचान लिया था कि ये ब्राह्मण वास्तव में पांडव हैं। श्रीकृष्ण ने राजाओं को समझाया, "यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि पांडुपुत्र अर्जुन हैं। उन्होंने अपनी योग्यता से द्रौपदी को जीता है। आप सभी को यह स्वीकार करना चाहिए।"
पांडवों की पहचान
श्रीकृष्ण की बात सुनकर राजा चुप हो गए। उन्होंने पांडवों को पहचान लिया। द्रुपद अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने कहा, "मुझे गर्व है कि मेरी पुत्री का वर अर्जुन जैसा महान योद्धा है।"
द्रुपद की प्रसन्नता
द्रुपद ने पांडवों का स्वागत किया और उन्हें राजसम्मान दिया। उन्होंने सोचा, "पांडव मेरे शत्रु द्रोण के शिष्य तो हैं, लेकिन वे धर्मात्मा हैं। मेरी पुत्री उनके हाथों सुरक्षित रहेगी।"
अर्जुन ने द्रुपद को प्रणाम किया और कहा, "राजन! हम ब्राह्मण वेश में घूम रहे थे। हमारे साथ हमारी माता कुंती और हमारे चार भाई भी हैं। हम पांचों पांडव हैं।"
"हे राजन! हम पांच पांडव हैं। हमारी माता कुंती और हमारे भाई युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव। हम वनवास के कारण इस वेश में हैं। कृपया हमें क्षमा करें।"
- अर्जुन, द्रुपद से
स्वयंवर के महत्वपूर्ण पहलू:
- मत्स्य यंत्र चुनौती: अत्यंत कठिन परीक्षा जिसमें केवल प्रतिबिंब देखकर लक्ष्य भेदना था।
- राजाओं की विफलता: दुर्योधन, शिशुपाल, जरासंध सहित सभी राजा असफल रहे।
- कर्ण का अपमान: द्रौपदी ने कर्ण को सूतपुत्र कहकर अस्वीकार किया।
- अर्जुन की विजय: ब्राह्मण वेश में अर्जुन ने लक्ष्य भेदा।
- राजाओं का आक्रमण: असफल राजाओं ने पांडवों पर आक्रमण किया।
- श्रीकृष्ण की पहचान: श्रीकृष्ण ने राजाओं को पांडवों की पहचान कराई।
निष्कर्ष
अर्जुन द्वारा द्रौपदी स्वयंवर में विजय प्राप्त करना महाभारत की एक महत्वपूर्ण घटना है। इसने न केवल अर्जुन के अद्वितीय धनुर्विद्या कौशल को सिद्ध किया, बल्कि पांडवों और द्रौपदी के भाग्य को भी एक सूत्र में बाँध दिया। इस घटना के बाद, द्रौपदी पांडवों के साथ हस्तिनापुर लौटीं, जहाँ एक और अप्रत्याशित घटना घटी - कुंती की भूल जिसके कारण द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी बनीं। अगले अध्याय में हम कुंती की भूल और पंचपत्नीत्व की कथा पढ़ेंगे।
घटनाक्रम
स्वयंवर की घोषणा
द्रुपद द्वारा द्रौपदी के स्वयंवर की भव्य घोषणा। मत्स्य यंत्र चुनौती की स्थापना।
राजाओं का आगमन
दूर-दूर से राजा, महाराजा और राजकुमार स्वयंवर में शामिल होने आते हैं।
राजाओं का असफल प्रयास
दुर्योधन, शिशुपाल, जरासंध सहित सभी राजा मत्स्य यंत्र भेदने में असफल रहते हैं।
कर्ण का अपमान
कर्ण प्रयास करता है, लेकिन द्रौपदी उसे सूतपुत्र कहकर अस्वीकार करती है।
अर्जुन का लक्ष्य भेदन
ब्राह्मण वेश में अर्जुन धनुष उठाते हैं और मत्स्य यंत्र भेदते हैं।
राजाओं का आक्रमण
असफल राजा पांडवों पर आक्रमण करते हैं। भीम और अर्जुन उन्हें परास्त करते हैं।
श्रीकृष्ण की पहचान
श्रीकृष्ण राजाओं को पांडवों की पहचान कराते हैं। द्रुपद पांडवों का स्वागत करते हैं।
प्रमुख पात्र
अर्जुन
तीसरे पांडव, द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य। ब्राह्मण वेश में द्रौपदी स्वयंवर में लक्ष्य भेदा।
द्रौपदी
द्रुपद की पुत्री, अग्नि कुंड से जन्मी। अर्जुन को वरमाला पहनाई।
द्रुपद
पांचाल नरेश, द्रौपदी के पिता। स्वयंवर के आयोजक। पांडवों को देखकर प्रसन्न।
दुर्योधन
ज्येष्ठ कौरव। स्वयंवर में असफल रहा। बाद में राजाओं के साथ पांडवों पर आक्रमण किया।
कर्ण
सूर्यपुत्र, अंगराज। स्वयंवर में प्रयास किया लेकिन द्रौपदी ने अस्वीकार किया।
श्रीकृष्ण
द्वारकाधीश। स्वयंवर में उपस्थित। राजाओं को पांडवों की पहचान कराई।
भीम
द्वितीय पांडव। राजाओं के आक्रमण के समय गदा युद्ध में सभी को परास्त किया।
शिशुपाल, जरासंध, शल्य
अन्य राजा जो स्वयंवर में असफल रहे और बाद में पांडवों से युद्ध किया।
अर्जुन की विजय से सीख
एकाग्रता की शक्ति
अर्जुन ने केवल प्रतिबिंब देखकर लक्ष्य भेदा। यह एकाग्रता और अभ्यास का परिणाम था।
योग्यता जन्म से नहीं
राजा और राजकुमार असफल हुए, लेकिन एक साधारण ब्राह्मण (अर्जुन) ने सफलता प्राप्त की। योग्यता जन्म से नहीं, परिश्रम से आती है।
अपमान का परिणाम
द्रौपदी ने कर्ण का अपमान किया। इस अपमान ने कर्ण को दुर्योधन का और भी करीबी बना दिया।
अहंकार का परिणाम
असफल राजाओं ने अपने अहंकार में पांडवों पर आक्रमण किया और पराजित हुए। अहंकार पतन का कारण बनता है।
पहचान से परे योग्यता
लोगों ने पांडवों को ब्राह्मण समझा, लेकिन उनकी योग्यता ने सबको चकित कर दिया। योग्यता पहचान से परे होती है।
धर्म की जीत
अर्जुन ने धर्मपूर्वक स्वयंवर जीता। सत्य और धर्म की हमेशा जीत होती है।