दिन 4: भीष्म का जन्म और प्रतिज्ञा

निष्ठा और धर्म का संकल्प - आजीवन ब्रह्मचर्य और हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए सब कुछ छोड़ने की कथा

दिन 4/77
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आदिपर्व
प्रतिज्ञा और त्याग
4
भीष्म का जन्म और प्रतिज्ञा

वह प्रतिज्ञा जिसने इतिहास बदल दिया

आदिपर्व भीष्म प्रतिज्ञा त्याग और निष्ठा आजीवन ब्रह्मचर्य

देवव्रत, जो अब युवावस्था में प्रवेश कर चुका था, हस्तिनापुर का युवराज और सर्वश्रेष्ठ योद्धा बन चुका था। उसकी वीरता, बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता की चर्चा पूरे राज्य में फैल चुकी थी। परंतु राजा शांतनु के जीवन में एक नया मोड़ आने वाला था।

शांतनु का द्वितीय प्रेम

एक दिन यमुना नदी के तट पर शांतनु की भेंट एक अद्भुत सुंदरी सत्यवती से हुई। वह एक मछुआरे की पुत्री थी, परंतु उसके सौंदर्य और व्यक्तित्व ने शांतनु को मोहित कर लिया। शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे, परंतु सत्यवती के पिता ने एक शर्त रखी: सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा होगा।

शांतनु की दुविधा

शांतनु इस शर्त को स्वीकार नहीं कर सके। देवव्रत उनका ज्येष्ठ पुत्र और योग्य उत्तराधिकारी था। उसे सिंहासन से वंचित करना अन्याय होता। परंतु सत्यवती के प्रेम में वे इतने डूब चुके थे कि उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। वे उदास और चिंतित रहने लगे।

"पिता की चिंता देखकर देवव्रत ने सत्य का पता लगाया। जब उन्हें पता चला कि उनके पिता सत्यवती से विवाह करना चाहते हैं, परंतु उसकी शर्त के कारण नहीं कर पा रहे हैं, तो देवव्रत ने एक निर्णय लिया जो इतिहास में अमर हो गया।"

- महाभारत की शिक्षा

वह ऐतिहासिक प्रतिज्ञा

देवव्रत सीधे सत्यवती के पिता के पास गए। उन्होंने घोषणा की: "मैं आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा। मैं कभी विवाह नहीं करूंगा और न ही मेरी कोई संतान होगी। इस प्रकार सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा होगा।"

प्रतिज्ञा के तीन भाग:

  • आजीवन ब्रह्मचर्य: देवव्रत ने जीवन भर विवाह न करने की प्रतिज्ञा की
  • संतान त्याग: उन्होंने अपनी कोई संतान न होने देने का संकल्प लिया
  • सिंहासन त्याग: हस्तिनापुर का सिंहासन सत्यवती के पुत्रों के लिए छोड़ दिया
  • सेवा का व्रत: वे हस्तिनापुर की सेवा में जीवन व्यतीत करेंगे

भीष्म नाम की प्राप्ति

जब शांतनु को देवव्रत की इस अद्भुत प्रतिज्ञा के बारे में पता चला, तो वे अवाक रह गए। वे देवव्रत के पास गए और उन्हें गले लगा लिया। भावुक होकर बोले: "हे पुत्र, तुमने एक भीषण प्रतिज्ञा ली है। आज से तुम्हारा नाम 'भीष्म' होगा, जिसका अर्थ है 'भीषण प्रतिज्ञा वाला'।"

इसके साथ ही शांतनु ने भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया। "तुम जब चाहोगे, तभी मृत्यु को प्राप्त होगे। तुम पर कोई भी हथियार असर नहीं करेगा, जब तक तुम स्वयं न चाहो।"

इच्छामृत्यु का वरदान

भीष्म को मिला यह वरदान उनकी महानता का प्रतीक बना। वे स्वयं अपनी मृत्यु का समय चुन सकते थे। यह वरदान उनके त्याग और निष्ठा के प्रति शांतनु की कृतज्ञता थी। इस वरदान के कारण भीष्म महाभारत युद्ध में भी तब तक जीवित रहे, जब तक उन्होंने स्वयं मृत्यु को नहीं चुना।

प्रतिज्ञा के परिणाम

भीष्म की इस प्रतिज्ञा के तुरंत बाद शांतनु ने सत्यवती से विवाह कर लिया। सत्यवती के दो पुत्र हुए - चित्रांगद और विचित्रवीर्य। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए उन दोनों को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बनाया और स्वयं उनकी रक्षा और शिक्षा का दायित्व संभाला।

प्रतिज्ञा का महत्व:

  • पितृभक्ति: पिता की इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ त्याग दिया
  • राजधर्म: राज्य की निरंतरता के लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का त्याग
  • वचनबद्धता: एक बार दिया गया वचन जीवन भर निभाया
  • निष्ठा: हस्तिनापुर के प्रति अटूट निष्ठा और सेवा भाव
  • संयम: आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर संयम

महाभारत में भीष्म का महत्व

भीष्म की यह प्रतिज्ञा महाभारत की कहानी की नींव बनी। इसके कारण:

  • हस्तिनापुर का सिंहासन सत्यवती के वंशजों को मिला
  • भीष्म ने आजीवन हस्तिनापुर की सेवा की
  • महाभारत युद्ध में भीष्म कौरवों के सेनापति बने
  • उनकी प्रतिज्ञा ने पांडवों और कौरवों के भाग्य को प्रभावित किया
  • भीष्म ने युद्ध के दौरान भी धर्म का पालन किया

आधुनिक संदर्भ में सीख

भीष्म की प्रतिज्ञा से हमें आज के जीवन में यह सीख मिलती है:

  • प्रतिबद्धता: एक बार लिया गया निर्णय जीवन भर निभाना
  • पारिवारिक मूल्य: परिवार की खुशी के लिए व्यक्तिगत सुख का त्याग
  • संयम और अनुशासन: जीवन में संयम बनाए रखना
  • दायित्वबोध: बड़े उद्देश्य के लिए छोटे स्वार्थों का त्याग
  • नैतिक बल: नैतिकता और धर्म के लिए सब कुछ अर्पित कर देना
  • वफादारी: संस्था या राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा

भीष्म की यह प्रतिज्ञा न केवल एक व्यक्तिगत संकल्प थी, बल्कि यह एक राजनैतिक और सामाजिक दायित्व भी थी। इसने हस्तिनापुर के भविष्य को सुरक्षित किया, परंतु साथ ही भीष्म के व्यक्तिगत जीवन को बलिदान की भेंट चढ़ा दिया। अगले अध्याय में हम सत्यवती के अतीत और भविष्य के बारे में जानेंगे।

भीष्म प्रतिज्ञा की समयरेखा

देवव्रत का युवराज बनना

देवव्रत युवावस्था में प्रवेश करते हैं और हस्तिनापुर के युवराज बनते हैं। वे सर्वश्रेष्ठ योद्धा और प्रशासक साबित होते हैं।

शांतनु की सत्यवती से भेंट

यमुना नदी के तट पर शांतनु की भेंट सत्यवती से होती है। शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते हैं।

सत्यवती के पिता की शर्त

सत्यवती के पिता शर्त रखते हैं कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा होगा। शांतनु इस शर्त को स्वीकार नहीं कर पाते।

शांतनु का स्वास्थ्य बिगड़ना

शांतनु सत्यवती के प्रेम में डूब जाते हैं और उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। वे उदास और चिंतित रहने लगते हैं।

देवव्रत को सच का पता चलना

देवव्रत अपने पिता की चिंता का कारण जानने का प्रयास करते हैं और सत्य का पता लगाते हैं।

भीषण प्रतिज्ञा

देवव्रत सत्यवती के पिता के सामने तीन प्रतिज्ञाएं करते हैं: आजीवन ब्रह्मचर्य, कोई संतान नहीं, और सिंहासन का त्याग।

भीष्म नाम की प्राप्ति

शांतनु देवव्रत को 'भीष्म' नाम देते हैं और उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्रदान करते हैं।

शांतनु-सत्यवती विवाह

भीष्म की प्रतिज्ञा के बाद शांतनु सत्यवती से विवाह कर लेते हैं। सत्यवती के दो पुत्र होते हैं।

इस अध्याय में वर्णित पात्र

भीष्म (देवव्रत)

शांतनु और गंगा के पुत्र, महान प्रतिज्ञा करने वाले, हस्तिनापुर के संरक्षक और महान योद्धा।

राजा शांतनु

भीष्म के पिता, सत्यवती के पति, भरतवंश के राजा जिन्होंने भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया।

सत्यवती

मछुआरे की पुत्री, शांतनु की द्वितीय पत्नी, चित्रांगद और विचित्रवीर्य की माता, व्यास की माता।

सत्यवती के पिता

मछुआरा जिसने शर्त रखी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा होगा।

चित्रांगद

शांतनु और सत्यवती के ज्येष्ठ पुत्र, हस्तिनापुर के राजा जिनकी अल्पायु में ही मृत्यु हो गई।

विचित्रवीर्य

शांतनु और सत्यवती के कनिष्ठ पुत्र, हस्तिनापुर के राजा, धृतराष्ट्र और पांडु के पिता।

भीष्म प्रतिज्ञा से जीवन के पाठ

प्रतिज्ञा का पालन

भीष्म ने एक बार प्रतिज्ञा करके जीवन भर उसका पालन किया। वचनबद्धता व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी है।

पितृभक्ति और त्याग

पिता की खुशी के लिए भीष्म ने सब कुछ त्याग दिया। परिवार के प्रति समर्पण महान गुण है।

राजधर्म का पालन

राज्य की निरंतरता के लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का त्याग। बड़े उद्देश्य के लिए छोटे स्वार्थों का बलिदान।

संयम और अनुशासन

आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर संयम। जीवन में अनुशासन सफलता की कुंजी है।

निष्ठा और सेवा

हस्तिनापुर के प्रति अटूट निष्ठा और सेवा भाव। संस्था या राष्ट्र के प्रति वफादारी।

नैतिक बल

नैतिकता और धर्म के लिए सब कुछ अर्पित कर देना। नैतिक बल शारीरिक बल से बड़ा होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भीष्म ने प्रतिज्ञा क्यों ली?
भीष्म ने यह प्रतिज्ञा अपने पिता शांतनु की खुशी के लिए ली। शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे, परंतु सत्यवती के पिता ने शर्त रखी थी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा होगा। चूंकि भीष्म ज्येष्ठ पुत्र थे, इसलिए शांतनु यह शर्त स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा से इस समस्या का समाधान किया।
भीष्म नाम का क्या अर्थ है?
'भीष्म' शब्द का अर्थ है 'भीषण प्रतिज्ञा वाला'। जब देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य, संतान त्याग और सिंहासन त्याग की प्रतिज्ञा ली, तो शांतनु ने उन्हें यह नाम दिया। यह नाम उनकी कठोर और अडिग प्रतिज्ञा का प्रतीक बन गया।
इच्छामृत्यु का वरदान क्या था?
शांतनु ने भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया था। इस वरदान के अनुसार, भीष्म स्वयं अपनी मृत्यु का समय चुन सकते थे। वे जब तक चाहते, तब तक जीवित रह सकते थे। उन पर कोई भी हथियार तब तक असर नहीं करता था, जब तक वे स्वयं न चाहते। इस वरदान के कारण वे महाभारत युद्ध में भी तब तक जीवित रहे, जब तक उन्होंने स्वयं मृत्यु को नहीं चुना।
क्या भीष्म को अपनी प्रतिज्ञा पर पछतावा हुआ?
महाभारत में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि भीष्म को अपनी प्रतिज्ञा पर पछतावा हुआ। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा का जीवन भर पालन किया और कभी शिकायत नहीं की। युद्ध के दौरान भी उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया और धर्म के मार्ग पर चले। उनकी प्रतिज्ञा उनकी पहचान और शक्ति बन गई।
इस प्रतिज्ञा का महाभारत पर क्या प्रभाव पड़ा?
भीष्म की प्रतिज्ञा ने महाभारत की दिशा ही बदल दी। इसके कारण: 1. हस्तिनापुर का सिंहासन सत्यवती के वंशजों को मिला 2. भीष्म आजीवन हस्तिनापुर के संरक्षक रहे 3. महाभारत युद्ध में भीष्म कौरवों के सेनापति बने 4. भीष्म ने युद्ध के दौरान भी धर्म का पालन किया 5. उनकी प्रतिज्ञा ने पांडवों और कौरवों के भाग्य को प्रभावित किया इस प्रकार यह प्रतिज्ञा महाभारत की कहानी की नींव बनी।

अध्याय की समझ जाँचें

1. भीष्म ने कितनी प्रतिज्ञाएं कीं?

A
1
B
2
C
3
D
4
सही उत्तर: 3

भीष्म ने तीन प्रतिज्ञाएं कीं: 1) आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन, 2) कोई संतान नहीं होगी, 3) हस्तिनापुर का सिंहासन सत्यवती के पुत्रों के लिए छोड़ दिया।

2. 'भीष्म' नाम का क्या अर्थ है?

A
महान योद्धा
B
देवताओं का व्रत
C
भीषण प्रतिज्ञा वाला
D
अजेय योद्धा
सही उत्तर: भीषण प्रतिज्ञा वाला

जब देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य, संतान त्याग और सिंहासन त्याग की प्रतिज्ञा ली, तो शांतनु ने उन्हें 'भीष्म' नाम दिया, जिसका अर्थ है 'भीषण प्रतिज्ञा वाला'।

3. शांतनु ने भीष्म को कौन सा वरदान दिया?

A
अमरता का वरदान
B
अजेय होने का वरदान
C
इच्छामृत्यु का वरदान
D
समस्त विद्याओं का ज्ञान
सही उत्तर: इच्छामृत्यु का वरदान

शांतनु ने भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया। इस वरदान के अनुसार, भीष्म स्वयं अपनी मृत्यु का समय चुन सकते थे और जब तक चाहते, तब तक जीवित रह सकते थे।

4. सत्यवती के पिता ने क्या शर्त रखी थी?

A
शांतनु को राज्य छोड़ना होगा
B
भीष्म को देश निकाला देना होगा
C
सत्यवती का पुत्र ही अगला राजा होगा
D
सत्यवती को महारानी बनाना होगा
सही उत्तर: सत्यवती का पुत्र ही अगला राजा होगा

सत्यवती के पिता ने शर्त रखी थी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा होगा। यही शर्त शांतनु के लिए समस्या बन गई क्योंकि भीष्म ज्येष्ठ पुत्र थे।

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