दिन 40: भीष्म का वध
10वें दिन का युद्ध: शिखंडी की छत्रछाया में अर्जुन का अंतिम वार
10वें दिन: युद्ध का सबसे निर्णायक क्षण
9 दिनों के भीषण युद्ध के बाद, पांडवों को एहसास हो गया था कि जब तक भीष्म जीवित हैं, कौरवों को हराना असंभव है। भीष्म प्रतिदिन 10,000 से अधिक पांडव सैनिकों को मार रहे थे। पांडव सेना का मनोबल टूट रहा था।
भीष्म की अजेयता
भीष्म ने 9 दिनों तक अकेले ही पांडव सेना का सामना किया। उनके बाण इतने तेज और सटीक थे कि कोई भी योद्धा उनके सामने टिक नहीं सकता था। उन्होंने पांडवों के कई महान योद्धाओं को परास्त किया।
रात में, पांडवों ने अपने शिविर में बैठकर भीष्म को परास्त करने की रणनीति बनाई। श्रीकृष्ण ने कहा, "भीष्म को केवल एक ही व्यक्ति परास्त कर सकता है - शिखंडी। क्योंकि भीष्म ने शिखंडी के सामने कभी अस्त्र नहीं उठाए हैं।"
शिखंडी की रणनीति
शिखंडी द्रुपद का पुत्र था, लेकिन वह पूर्वजन्म में अम्बा नामक स्त्री थी, जिसे भीष्म ने अपहरण किया था और फिर अस्वीकार कर दिया था। अम्बा ने प्रतिज्ञा की थी कि वह भीष्म का वध करेगी।
"हे भीष्म! आज मैं अपनी पूर्वजन्म की प्रतिज्ञा पूरी करूंगा। आपने अम्बा का अपमान किया था, आज मैं शिखंडी बनकर आपका वध करूंगा।"
- शिखंडी, भीष्म से
श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया, "अर्जुन, तुम शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्म पर बाण चलाओ। भीष्म शिखंडी पर अस्त्र नहीं चलाएंगे, इसलिए वे तुम्हारे बाणों को भी नहीं रोक पाएंगे।"
शिखंडी का आगे आना
10वें दिन, शिखंडी ने अपना रथ भीष्म की ओर बढ़ाया। भीष्म ने शिखंडी को देखा और अपने अस्त्र नीचे कर दिए। उन्होंने कहा, "मैं शिखंडी पर अस्त्र नहीं चलाऊंगा, क्योंकि वे पूर्वजन्म में स्त्री थीं।"
अर्जुन का वार
जब भीष्म ने अपने अस्त्र नीचे किए, तो अर्जुन ने शिखंडी के पीछे से अपने बाण चलाए। भीष्म ने अर्जुन के बाणों को रोकने की कोशिश की, लेकिन शिखंडी के डर से वे पूरी शक्ति नहीं लगा पाए।
भीष्म का पतन
अर्जुन के बाण भीष्म के शरीर में इस प्रकार लगे कि उनका पूरा शरीर बाणों से छलनी हो गया। भीष्म रथ से नीचे गिर गए, लेकिन वे जमीन पर नहीं गिरे - उनका शरीर बाणों के जाल पर लटक गया।
शरशय्या - बाणों का बिछौना
भीष्म का शरीर बाणों से भर गया था। उनके शरीर से रक्त बह रहा था, लेकिन वे जमीन पर नहीं गिरे क्योंकि बाणों ने उन्हें ऊपर उठा लिया। यह शरशय्या (बाणों का बिछौना) कहलाती है। इस अवस्था में भी उन्होंने आत्म-संयम नहीं खोया।
भीष्म के गिरते ही दोनों सेनाओं में हलचल मच गई। दुर्योधन चिल्लाया, "पितामह!" लेकिन भीष्म ने कहा, "मैंने अपना कर्तव्य पूरा किया। अब तुम लोग युद्ध जारी रखो।"
शरशय्या पर भीष्म
भीष्म ने शरशय्या पर लेटकर कहा, "हे अर्जुन! तुमने मुझे परास्त किया है। मुझे तुम पर गर्व है। लेकिन मुझे अभी तक प्यास लगी है।" अर्जुन ने तुरंत एक बाण चलाकर पृथ्वी को छेद दिया और जल की धारा निकाली, जो भीष्म के मुँह तक पहुँच गई।
"हे अर्जुन! तुमने मुझे प्यास बुझाई है। तुम सच्चे योद्धा हो। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम युद्ध में विजयी होओ। लेकिन याद रखना, युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है। द्रोण और कर्ण अभी बाकी हैं।"
- भीष्म, शरशय्या पर अर्जुन से
भीष्म ने युद्ध का अंत देखने के लिए उत्तरी अयन का इंतजार करने का निश्चय किया। उन्होंने कहा, "मैं उत्तरी अयन (जब सूर्य उत्तर दिशा में जाता है) तक जीवित रहूंगा और तब प्राण त्यागूंगा।"
युद्ध का दसवाँ दिन
कौरवों का शोक
भीष्म के पतन के बाद, कौरव सेना में शोक की लहर दौड़ गई। दुर्योधन रोने लगा और उसने कहा, "पितामह! आपके बिना हम युद्ध कैसे जीतेंगे?"
पांडवों की खुशी
पांडवों को बहुत खुशी हुई कि भीष्म गिर गए हैं। लेकिन श्रीकृष्ण ने कहा, "अभी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। द्रोणाचार्य अब सेनापति बनेंगे, और वे भीष्म से भी अधिक खतरनाक हो सकते हैं।"
इस प्रकार, कुरुक्षेत्र युद्ध का 10वाँ दिन भीष्म के पतन का साक्षी बना। यह युद्ध का पहला बड़ा मोड़ था, लेकिन युद्ध अभी बाकी था।
भीष्म के पतन के महत्वपूर्ण पहलू:
- शिखंडी की रणनीति: भीष्म ने शिखंडी पर अस्त्र नहीं चलाए क्योंकि वे पूर्वजन्म में स्त्री थीं।
- अर्जुन का वार: अर्जुन ने शिखंडी के पीछे से भीष्म पर बाण चलाए।
- शरशय्या: भीष्म बाणों के जाल पर लटक गए और वहाँ प्राण त्यागने की प्रतीक्षा करने लगे।
- भीष्म का आशीर्वाद: अर्जुन को आशीर्वाद दिया कि वह विजयी हो।
- युद्ध की अनिवार्यता: भीष्म के पतन के बाद भी युद्ध जारी रहा।
निष्कर्ष
भीष्म का पतन कुरुक्षेत्र युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। यह घटना न केवल भीष्म की वीरता और आत्म-संयम को दर्शाती है, बल्कि युद्ध की भीषणता और धर्म की जटिलता को भी उजागर करती है। भीष्म ने अपने अंतिम क्षणों में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। शरशय्या पर लेटकर उन्होंने अर्जुन को आशीर्वाद दिया और युद्ध के नियमों की याद दिलाई। अगले अध्याय में हम द्रोणाचार्य के सेनापति बनने और उनके पराक्रम की कथा पढ़ेंगे।
घटनाक्रम
9 दिनों का युद्ध
भीष्म ने 9 दिनों तक अपनी अद्वितीय वीरता दिखाई और पांडव सेना को भारी नुकसान पहुँचाया।
रणनीति निर्धारण
श्रीकृष्ण ने शिखंडी को भीष्म के सामने भेजने की रणनीति बनाई।
10वें दिन का युद्ध
शिखंडी ने भीष्म का सामना किया। भीष्म ने शिखंडी पर अस्त्र नहीं चलाए।
अर्जुन का अंतिम वार
अर्जुन ने शिखंडी के पीछे से भीष्म पर बाण चलाए और उन्हें परास्त किया।
शरशय्या
भीष्म बाणों के जाल पर लटक गए और उत्तरी अयन की प्रतीक्षा करने लगे।
भीष्म का आशीर्वाद
भीष्म ने अर्जुन को आशीर्वाद दिया और युद्ध के नियमों की याद दिलाई।
प्रमुख पात्र
भीष्म
कुरुवंश के पितामह। 10वें दिन अर्जुन के बाणों से परास्त हुए और शरशय्या पर लेट गए। उन्होंने अर्जुन को आशीर्वाद दिया।
अर्जुन
तीसरे पांडव। शिखंडी के पीछे से भीष्म पर बाण चलाकर उन्हें परास्त किया।
शिखंडी
द्रुपद के पुत्र। पूर्वजन्म में अम्बा थे। उन्होंने भीष्म के सामने अपना रथ बढ़ाया और भीष्म ने अस्त्र नीचे कर दिए।
श्रीकृष्ण
अर्जुन के सारथी। उन्होंने शिखंडी को भीष्म के सामने भेजने की रणनीति बनाई।
दुर्योधन
ज्येष्ठ कौरव। भीष्म के पतन पर रोया और शोक मनाया।
युधिष्ठिर
ज्येष्ठ पांडव। भीष्म के पतन से प्रसन्न, लेकिन युद्ध की चिंता बनी रही।
भीष्म के पतन से सीख
वीरता का अंतिम साक्षी
भीष्म ने अपने अंतिम क्षणों में भी वीरता और आत्म-संयम नहीं खोया। सच्चा योद्धा अंत तक धर्म पर अडिग रहता है।
धर्म की जटिलता
भीष्म को अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन करना था, जिसके कारण उन्होंने कौरवों का साथ दिया। धर्म हमेशा सरल नहीं होता।
क्षमा और आशीर्वाद
भीष्म ने अपने वध करने वाले अर्जुन को आशीर्वाद दिया। यह उनकी महानता को दर्शाता है।
रणनीति का महत्व
श्रीकृष्ण की रणनीति ने भीष्म के पतन को संभव बनाया। रणनीति के बिना शक्ति भी निष्फल है।
मित्रता और दायित्व
भीष्म ने अपने कर्तव्यों का पालन किया। हमें भी अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
अधर्म का परिणाम
भीष्म का पतन अधर्म की पराजय का संकेत था। धर्म की हमेशा विजय होती है।